जापान के एक विश्वविद्यालय स्टार्टअप का पुनर्वास रोबोट दिखा रहा है कि विज्ञान कैसे लोगों का जीवन बदल सकता है

जापान के इवाते प्रांत के मोरिओका शहर स्थित चिकित्सा प्रौद्योगिकी कंपनी “तोहोकू मेडिकल सिस्टम्स” को हाल ही में “फ्यूचर प्रेस रिलीज़ इन इवाते 2026” प्रतियोगिता में रोडमैप अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

यह सम्मान उसके पुनर्वास रोबोट “Ouvert (ऊवेर)” के लिए प्रस्तुत वर्ष 2036 की दीर्घकालिक विकास योजना के कारण दिया गया।

लेकिन यह कहानी केवल एक पुरस्कार की नहीं है।

यह उस यात्रा की कहानी है जिसमें विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाओं में जन्मी तकनीक वास्तविक मरीजों की सहायता करने वाले चिकित्सा उपकरण में बदल गई।

तोहोकू मेडिकल सिस्टम्स की तकनीकी नींव इवाते विश्वविद्यालय और तोहोकू विश्वविद्यालय में विकसित रोबोटिक्स अनुसंधान से जुड़ी है। 2013 से शोधकर्ताओं, इंजीनियरों, चिकित्सकों और पुनर्वास विशेषज्ञों ने मिलकर काम करना शुरू किया ताकि स्ट्रोक के बाद हाथों की कार्यक्षमता खो चुके मरीजों के लिए बेहतर समाधान विकसित किया जा सके।

बारह वर्षों से अधिक के अनुसंधान और विकास के बाद “Ouvert” जापान में स्वीकृत चिकित्सा उपकरण के रूप में सामने आया।

यह रोबोट उन मरीजों की सहायता करता है जिनके शरीर के एक हिस्से में पक्षाघात हो गया है। मरीज अपने स्वस्थ हाथ को हिलाता है और रोबोट प्रभावित हाथ को उसी प्रकार की गतिविधि करने में मदद करता है।

सिस्टम में दृश्य प्रतिक्रिया और गेम आधारित प्रशिक्षण भी शामिल है, जिससे मरीज लंबे समय तक पुनर्वास अभ्यास जारी रखने के लिए प्रेरित होते हैं।

यह तकनीक केवल हाथ की गति वापस लाने का प्रयास नहीं करती।

यह किसी व्यक्ति को फिर से अपना नाम लिखने, भोजन करने, मोबाइल फोन उपयोग करने या अपने प्रियजनों का हाथ पकड़ने की क्षमता वापस दिलाने का प्रयास करती है।

इसी कारण जापान में इसे केवल चिकित्सा तकनीक नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता सुधारने वाली तकनीक के रूप में देखा जा रहा है।

आज जापान तेजी से वृद्ध होती आबादी का सामना कर रहा है। पुनर्वास सेवाओं की मांग बढ़ रही है जबकि चिकित्सा क्षेत्र में प्रशिक्षित कर्मियों की कमी भी चुनौती बनती जा रही है।

ऐसी स्थिति में “Ouvert” जैसे उपकरण चिकित्सकों का स्थान लेने के लिए नहीं, बल्कि उनकी क्षमता को बढ़ाने के लिए विकसित किए जा रहे हैं।

टोक्यो से सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित मोरिओका में विकसित यह तकनीक इस बात का उदाहरण है कि विश्वस्तरीय नवाचार केवल बड़े महानगरों से ही नहीं आते।

टिप्पणियाँ

भारतीय पाठकों के लिए सबसे रोचक प्रश्न यह हो सकता है कि तोहोकू विश्वविद्यालय आखिर कितना महत्वपूर्ण है।

जापान में तोहोकू विश्वविद्यालय को उसी सम्मान से देखा जाता है जैसे भारत में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) या भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc Bengaluru) को देखा जाता है।

यह केवल एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय नहीं है, बल्कि ऐसा संस्थान है जिसने विज्ञान, इंजीनियरिंग, उद्योग और समाज के बीच मजबूत संबंध स्थापित किए हैं।

जैसे IIT से निकलने वाले छात्र भारत की स्टार्टअप और तकनीकी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रहे हैं, वैसे ही तोहोकू विश्वविद्यालय ने जापान के उद्योग, विज्ञान और चिकित्सा क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

इस कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भारत और जापान की समान चुनौतियाँ हैं।

भारत दुनिया में सबसे अधिक स्ट्रोक रोगियों वाले देशों में से एक है। साथ ही जीवन प्रत्याशा बढ़ने के कारण पुनर्वास सेवाओं की आवश्यकता भी बढ़ रही है।

हालाँकि भारत की जनसंख्या संरचना जापान की तुलना में अभी युवा है, लेकिन आने वाले दशकों में वृद्धजन आबादी तेजी से बढ़ेगी।

इसलिए जापान में विकसित पुनर्वास तकनीकें भविष्य में भारत जैसे देशों के लिए भी उपयोगी मॉडल बन सकती हैं।

एक और कारण है कि यह कहानी भारतीय पाठकों को आकर्षित कर सकती है।

भारत में आज “स्टार्टअप इंडिया” और “मेक इन इंडिया” जैसे कार्यक्रम विश्वविद्यालय अनुसंधान को उद्योग से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

तोहोकू मेडिकल सिस्टम्स की कहानी दिखाती है कि जब विश्वविद्यालय, अस्पताल, इंजीनियर और उद्यमी लंबे समय तक साथ काम करते हैं, तो प्रयोगशाला की तकनीक वास्तविक सामाजिक समाधान में बदल सकती है।

इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश यह नहीं है कि एक नया रोबोट बना है।

संदेश यह है कि शिक्षा, विज्ञान और मानवीय संवेदनशीलता मिलकर ऐसे समाधान बना सकते हैं जो लोगों की गरिमा, स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं।

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