वह केवल गरम कॉफ़ी चाहती थी।
गली में लाल मशीन चुपचाप साँस ले रही थी।
सिक्का गिरा, रोशनी जली, एक क्षण का संकोच।
हाथ डालते ही दुनिया मुड़ गई।
मशीन शहर का पेट बन गई।
वह रोज़मर्रा की गर्माहट के साथ निगल ली गई।
अंदर सब कुछ कोमल था।
शहर की आवाज़ उसकी धड़कन के साथ मिट गई।
यह उपभोग की जगह नहीं थी, पुनर्व्यवस्था की जगह थी।
आख़िर में स्लॉट खुला।
वह नहीं, उसकी हँसी बाहर आई।
शहर चलता रहा।
मशीन शांत हो गई।

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