स्नीकर्स से बिजनेस वर्ल्ड तक: भारत के 20s युवाओं की स्टूडेंट से प्रोफेशनल बनने की कहानी

रात का शहर तेज रोशनी में आगे बढ़ता दिखता है। लाल और सुनहरी लाइटें सड़क पर फैल रही हैं, और एक युवा अपने कदमों से उस रफ्तार को पकड़ने की कोशिश कर रहा है।

उसके पैरों में स्नीकर्स हैं।

चमकते हुए फॉर्मल जूते नहीं। पुराने दौर के बिजनेसमैन वाली पारंपरिक छवि नहीं। स्नीकर्स, जो अभी भी कॉलेज कैंपस, हॉस्टल, कोचिंग क्लास, दोस्तों के साथ चाय, देर रात की पढ़ाई और पहले इंटरव्यू की घबराहट की याद दिलाते हैं।

लेकिन अब वह सिर्फ स्टूडेंट नहीं है।

भारत में 20s की उम्र अक्सर एक बड़े बदलाव की उम्र होती है। कॉलेज से नौकरी। डिग्री से सैलरी। परीक्षा से इंटरव्यू। और “बेटा, आगे क्या करोगे?” से “अब करियर में क्या प्लान है?” तक का सफर।

दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, अहमदाबाद या गुरुग्राम, शहर अलग हो सकते हैं, लेकिन कहानी मिलती-जुलती है। कोई आईटी कंपनी में पहला दिन शुरू कर रहा है। कोई स्टार्टअप में लंबी शिफ्ट कर रहा है। कोई MBA, UPSC, CA, coding bootcamp या सरकारी नौकरी की तैयारी के बीच अपना रास्ता खोज रहा है। कोई फ्रीलांसिंग, डिजिटल मार्केटिंग, कंटेंट क्रिएशन, AI tools या ई-कॉमर्स से अपनी पहचान बना रहा है।

आज के भारतीय 20s युवाओं के लिए करियर सिर्फ नौकरी नहीं है। यह परिवार की उम्मीद, आर्थिक स्वतंत्रता, शहर में टिके रहने की कोशिश, घर भेजी जाने वाली पहली सैलरी, और अपने नाम से कुछ बनाने की शुरुआत भी है।

इस फोटो के स्नीकर्स इसी बदलाव का प्रतीक लगते हैं।

स्नीकर्स में अभी भी युवापन है। लचीलापन है। भागने, सीखने और गिरकर फिर उठने की ऊर्जा है। लेकिन आसपास की तेज रोशनी और शहर की गति बताती है कि अब दुनिया बदल चुकी है। अब सिर्फ मार्क्स नहीं, परफॉर्मेंस मायने रखती है। अब सिर्फ सपने नहीं, डेडलाइन भी हैं। अब सिर्फ दोस्त नहीं, नेटवर्क भी है।

भारत में बहुत से युवाओं के लिए प्रोफेशनल बनने का मतलब केवल फॉर्मल कपड़े पहनना नहीं है। इसका मतलब है समय पर पहुंचना, जिम्मेदारी लेना, अंग्रेजी और लोकल भाषा दोनों में आत्मविश्वास से बात करना, परिवार की उम्मीदों को संभालना, और साथ ही खुद की पहचान भी बचाए रखना।

पुरानी पीढ़ी के लिए बिजनेसमैन की तस्वीर शायद सूट, टाई और चमड़े के जूतों से जुड़ी थी। लेकिन नई पीढ़ी की तस्वीर अलग है। लैपटॉप बैग, स्मार्टफोन, UPI पेमेंट, ऑनलाइन मीटिंग, कोवर्किंग स्पेस, स्टार्टअप कल्चर और पैरों में स्नीकर्स।

यह बदलाव फैशन से बड़ा है।

यह बताता है कि भारत का युवा काम को नए तरीके से देख रहा है। वह स्थिरता चाहता है, लेकिन स्वतंत्रता भी। वह अच्छी सैलरी चाहता है, लेकिन अर्थपूर्ण काम भी। वह परिवार को गर्व महसूस कराना चाहता है, लेकिन अपनी शर्तों पर आगे बढ़ना भी चाहता है।

सच्चा बदलाव तब शुरू होता है जब छात्र अपनी जिज्ञासा को कौशल में बदलता है। जब डर को अभ्यास में बदलता है। जब पहली असफलता को करियर का अंत नहीं, बल्कि सीखने की शुरुआत मानता है।

शहर तेज है। रास्ता आसान नहीं है। जूते अभी भी स्नीकर्स हैं।

लेकिन जो युवा इस रोशनी में आगे बढ़ रहा है, वह अब सिर्फ छात्र नहीं रहा। वह भारत की नई प्रोफेशनल पीढ़ी का हिस्सा बन चुका है।

टिप्पणी
Cross Marketing के 2026 sneaker survey के अनुसार, जापान में 20 से 69 वर्ष के लोगों में 74.7% लोग सप्ताह में कम से कम एक बार sneakers पहनते हैं। उम्र और लिंग के अनुसार, सप्ताह में एक बार या उससे अधिक sneakers पहनने की दर 20s पुरुषों में 78.2%, 30s पुरुषों में 74.5%, 40s पुरुषों में 73.6%, 50s पुरुषों में 69.1%, और 60s पुरुषों में 75.5% थी। महिलाओं में यह दर 20s में 75.5%, 30s में 78.2%, 40s में 80.0%, 50s में 71.8%, और 60s में 70.9% थी। खास तौर पर 20s पुरुषों में 42.7% ने कहा कि वे लगभग हर दिन sneakers पहनते हैं, जबकि 78.2% सप्ताह में कम से कम एक बार sneakers पहनते हैं।
Source: Cross Marketing, “Sneaker Survey 2026,” survey period: April 3-5, 2026, n=1,100.
https://www.cross-m.co.jp/report/trend-eye/20260408sneakers

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