जब कोई धुंध से ढके जंगल में चलता है, तो उसे एक अनोखी बात महसूस होती है।
दूर तक कुछ दिखाई नहीं देता।
यह भी नहीं पता होता कि मंज़िल कितनी दूर है।
और यह भी नहीं कि पेड़ों के उस पार क्या इंतज़ार कर रहा है।
फिर भी…
अगला एक कदम साफ़ दिखाई देता है।
शायद जीवन भी इसी जंगल की तरह है।
हर किसी के जीवन में ऐसे दिन आते हैं, जब भविष्य धुंधला लगता है।
काम उम्मीद के अनुसार नहीं चलता।
कोई सपना अधूरा रह जाता है।
दिल की पीड़ा किसी को दिखाई नहीं देती।
और कभी-कभी हम स्वयं भी अपने रास्ते को नहीं समझ पाते।
ऐसे समय में हमें लगता है कि हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम आगे का रास्ता नहीं देख पा रहे।
लेकिन शायद हमें आने वाले दस वर्षों को देखने की आवश्यकता ही नहीं है।
शायद हमें केवल आज एक कदम आगे बढ़ाने का साहस चाहिए।
धुंध अपना रास्ता केवल उसी को दिखाती है, जो चलते रहने का निर्णय करता है।
जो रुक जाता है, उसके सामने वही दृश्य बना रहता है।
लेकिन जो धीरे-धीरे भी आगे बढ़ता है, उसके सामने दुनिया स्वयं खुलने लगती है।
एक दिन धुंध अवश्य छँट जाती है।
और तब हमें एहसास होता है कि वह जंगल केवल डर की जगह नहीं था।
वही स्थान था, जहाँ हमने अपनी असली शक्ति को पहचाना।
जब जीवन का रास्ता स्पष्ट न दिखे, तो भागने की आवश्यकता नहीं है।
धीरे चलना भी पर्याप्त है।
बस एक कदम…
फिर एक और कदम।
क्योंकि रास्ता उसी के सामने प्रकट होता है, जो आगे बढ़ता रहता है।

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