एक युवा रात में शहर की सड़क पर चल रहा है।
लाइटें तेज़ हैं, लाल हैं, बेचैन हैं। सड़क ऐसी लगती है जैसे वह उस व्यक्ति के अगला कदम रखने से पहले ही आगे बढ़ रही हो।
उसके पैरों में स्नीकर्स हैं।
चमकदार चमड़े के जूते नहीं। पुराने बिज़नेस वर्ल्ड का औपचारिक प्रतीक नहीं। स्नीकर्स। वही जूते जिनमें अब भी कॉलेज के गलियारे, पार्ट-टाइम जॉब, देर रात की बातें और अभी तक किसी पद से परिभाषित न होने की आज़ादी बाकी है।
लेकिन कुछ बदल चुका है।
दुनिया भर में 20s के युवा एक ही अदृश्य रेखा पार कर रहे हैं। वे छात्र जीवन से निकलकर काम और व्यवसाय की दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, अहमदाबाद, ढाका, काठमांडू, कोलंबो, दुबई, सिंगापुर, टोक्यो और न्यूयॉर्क में यह बदलाव अलग-अलग दिखता है, लेकिन एहसास लगभग एक जैसा है।
एक दिन आपका नाम सिर्फ अंकों, दोस्तों और संभावनाओं से नहीं जुड़ा रहता। वह डेडलाइन, क्लाइंट, पैसा, निर्णय और जिम्मेदारी से जुड़ने लगता है।
पुरानी पीढ़ियों के लिए प्रोफेशनल बनना अक्सर कपड़ों से शुरू होता था।
सूट। टाई। चमड़े के जूते। तय ऑफिस। कंपनी की पहचान।
लेकिन आज की 20s पीढ़ी के लिए यह बदलाव इतना साफ दिखाई नहीं देता। वे अब भी स्नीकर्स पहन सकते हैं। वे ऑफिस में काम कर सकते हैं, कैफे से काम कर सकते हैं, को-वर्किंग स्पेस में बैठ सकते हैं या अपने कमरे से लैपटॉप खोल सकते हैं। वे AI टूल्स, फ्रीलांस प्रोजेक्ट्स, स्टार्टअप्स, साइड बिज़नेस, ग्लोबल प्लेटफॉर्म्स और रिमोट टीम्स के ज़रिए करियर बना सकते हैं।
यूनिफॉर्म बदल गई है। दबाव नहीं।
इस तस्वीर के स्नीकर्स यही कहानी बताते हैं।
वे अभी भी युवा हैं, लचीले हैं, ज़मीन के करीब हैं। लेकिन वे ऐसे शहर से गुजर रहे हैं जो स्पीड, प्रतिस्पर्धा और महत्वाकांक्षा से बना है। छात्र पूरी तरह गया नहीं है। बिज़नेसपर्सन पूरी तरह आया नहीं है। कुछ समय तक दोनों एक ही व्यक्ति के भीतर साथ रहते हैं।
यही 20s की असली कहानी है।
आप मीटिंग में बोलना सीखते हैं, बिना अपनी आवाज़ खोए। आप जिज्ञासा को कौशल में बदलना सीखते हैं। आप समझते हैं कि आत्मविश्वास कोई चीज़ नहीं है जो डिग्री के साथ मिलती है। वह चलते-चलते बनता है।
भारत और दक्षिण एशिया में यह बदलाव बहुत तेज़ी से दिख रहा है। बेंगलुरु की टेक कंपनियां, मुंबई की फाइनेंस और मीडिया दुनिया, दिल्ली-एनसीआर की स्टार्टअप संस्कृति, हैदराबाद का टेक इकोसिस्टम और पुणे-चेन्नई के नए प्रोफेशनल हब युवा लोगों को जल्दी जिम्मेदारी दे रहे हैं।
साथ ही, भारत के युवा अब सिर्फ “नौकरी” नहीं सोच रहे। वे स्किल, पर्सनल ब्रांड, अपस्किलिंग, फ्रीलांसिंग, कंटेंट क्रिएशन, डिजिटल बिज़नेस और ग्लोबल रिमोट वर्क के बारे में भी सोचते हैं। LinkedIn प्रोफाइल, GitHub प्रोजेक्ट, Instagram पेज, YouTube चैनल या छोटा ऑनलाइन बिज़नेस भी करियर का हिस्सा बन सकता है।
नई बिज़नेस पीढ़ी पुरानी जैसी नहीं दिखती।
वे चमड़े के जूतों की जगह स्नीकर्स चुन सकते हैं। ब्रीफकेस की जगह लैपटॉप। जीवनभर की नौकरी की जगह पोर्टफोलियो करियर। लेकिन उस कदम का अर्थ वही है।
बिज़नेस की दुनिया में वयस्क बनना सिर्फ अलग कपड़े पहनना नहीं है।
यह आगे बढ़ना है, युवावस्था की ऊर्जा, भविष्य की अनिश्चितता और वह जिम्मेदारी साथ लेकर कि आप ऐसे व्यक्ति बनें जिस पर दूसरे भरोसा कर सकें।
शहर चमक रहा है। रास्ता तेज़ है। जूते अब भी स्नीकर्स हैं।
लेकिन रोशनी के बीच चलने वाला व्यक्ति बदलना शुरू कर चुका है।
नोट्स
जापान की Cross Marketing कंपनी के “Sneaker Survey 2026” के अनुसार, 20 से 69 वर्ष की उम्र के 74.7% लोग सप्ताह में कम से कम एक बार स्नीकर्स पहनते हैं।
उम्र और लिंग के अनुसार, सप्ताह में कम से कम एक बार स्नीकर्स पहनने की दर पुरुषों में इस प्रकार थी: 20s में 78.2%, 30s में 74.5%, 40s में 73.6%, 50s में 69.1% और 60s में 75.5%। महिलाओं में यह दर 20s में 75.5%, 30s में 78.2%, 40s में 80.0%, 50s में 71.8% और 60s में 70.9% थी।
विशेष रूप से 20s के पुरुषों में, 42.7% ने कहा कि वे लगभग हर दिन स्नीकर्स पहनते हैं, जबकि 78.2% ने कहा कि वे सप्ताह में कम से कम एक बार स्नीकर्स पहनते हैं।
भारत और दक्षिण एशिया के संदर्भ में यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्नीकर्स अब केवल स्पोर्ट्स या कैज़ुअल फैशन नहीं रहे। वे युवा प्रोफेशनल्स, स्टार्टअप फाउंडर्स, टेक वर्कर्स, क्रिएटर्स और रिमोट वर्कर्स की नई कार्य संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं।
स्रोत: Cross Marketing, “Sneaker Survey 2026”
सर्वे अवधि: 3-5 अप्रैल 2026
नमूना आकार: n=1,100
https://www.cross-m.co.jp/report/trend-eye/20260408sneakers

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